Saturday, July 24, 2021
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अखिलेश की आज़म से मौहब्बत या मुस्लिम वोटों की चाहत?

  (शिब्ली रामपुरी) 

समाजवादी पार्टी के कद्दावर नेताओं में शुमार सपा सांसद आजम खान की याद एक बार फिर सपा अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को रामपुर खींच लाई. यहां पर अखिलेश यादव ने ना सिर्फ आजम खान की हिमायत में साइकिल रैली निकाली बल्कि काफी संख्या में लोगों को संबोधित भी किया और कहा कि आजम खान पर जितने मुकदमे दर्ज किए गए हैं आज तक किसी सांसद पर इतने मुकदमे दर्ज नहीं किए गए. काबिले गौर है कि समाजवादी पार्टी की सरकार में आजम खान का शुमार कद्दावर नेताओं में होता था और वह समाजवादी पार्टी के मुस्लिम चेहरे के तौर पर भी जाने और पहचाने जाते रहे हैं. समाजवादी पार्टी की सरकार जब से गई है तब से भाजपा की सरकार आने के बाद आजम खान की मुश्किलों में एक के बाद एक बढ़ोतरी होती रही है. 2017 में भाजपा सरकार आने के बाद आजम खान के खिलाफ कानूनी शिकंजा कसना आरंभ हुआ जो अभी तक जारी है. सपा सांसद आजम खान ने 26 फरवरी 2020 को रामपुर कोर्ट में सरेंडर किया था जिसके बाद 27 फरवरी को उन्हें रामपुर से सीतापुर जेल ट्रांसफर कर दिया गया था इसके बाद से आजम खान अभी तक जेल में बंद हैं. जहां तक इस मामले में समाजवादी पार्टी और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की बात है तो अखिलेश यादव आजम खान से सीतापुर जेल में सिर्फ एक बार मिलने गए थे. आजम खान के प्रति अखिलेश यादव के उदासीन रवैया का फायदा एमआईएम के चीफ असदुद्दीन ओवैसी से लेकर कांग्रेस पार्टी ने भी उठाने की भरपूर कोशिश की हालांकि आजम खान की ओर से इस तरफ कोई ऐसा इशारा या जवाब नहीं मिला कि जिससे कहा जा सके कि वह समाजवादी पार्टी को अलविदा कहकर असदुद्दीन ओवैसी या कांग्रेस के साथ जा सकते हैं लेकिन इतना जरूर है कि अखिलेश यादव का रवैया जिस तरह से आजम खान की रिहाई को लेकर उदासीन रहा उससे समाजवादी पार्टी के काफी नेताओं और खास तौर पर आजम खान के समर्थकों में गलत संदेश गया. दरअसल आजम खान के समर्थक यह मानते हैं कि जिस तरह से अखिलेश यादव दूसरे मुद्दों को उठाते हैं और उनके लिए सड़क पर उतरकर भी आवाज बुलंद करते हैं ऐसा आजम खान की रिहाई के लिए समाजवादी पार्टी ने सड़क पर उतरकर कोई आंदोलन क्यों नहीं किया. जिससे यह पता चलता है कि आजम खान के प्रति अखिलेश यादव का रवैया बेहद ही अफसोसनाक रहा है. फिलहाल अखिलेश यादव आजम खान का कई बार नाम ले चुके हैं और कुछ दिन पहले भी उन्होंने रामपुर जाकर आजम खान की पत्नी से मुलाकात की थी और अब फिलहाल वह रामपुर पहुंचे और वहां पर आजम खान की जौहर यूनिवर्सिटी को बचाने के लिए भी सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने अपने कंधे पर जिम्मेदारी उठाने की बात कही. दरअसल सियासी हलकों में चर्चा है कि जब से यह इशारा ओवैसी और कांग्रेस की ओर से मिला था कि अखिलेश यादव का रवैया आजम खान के प्रति अफसोसनाक और उदासीनता भरा रहा है तो अखिलेश यादव को चिंता सताने लगी कि कहीं आजम खान समाजवादी पार्टी को छोड़कर कांग्रेस ओवैसी या किसी और दल की और रुख़ ना कर लें.इससे समाजवादी पार्टी को मुस्लिम वोटों का जो नुकसान होगा उसका अंदाजा लगाना भी काफी काफी कठिन है. क्योंकि आजम खान का असर उनके लोकसभा क्षेत्र रामपुर में ही नहीं बल्कि आसपास के कई जिलों खासतौर पर पश्चिमी यूपी में मुस्लिम वोटों पर काफी पकड़ आजम खान की मजबूत है और यह बात अखिलेश यादव बखूबी जानते हैं. इसी के चलते अखिलेश यादव द्वारा एक बार फिर से आजम खान को याद करते हुए उन्होंने रामपुर का रुख किया और वहां पर आजम खान की हिमायत में साइकिल चलाई और कहा कि जब-जब साइकिल चलती है तब तक बदलाव आता है. अखिलेश यादव की साइकिल यात्रा पर भाजपा नेता और यूपी के डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य बड़ा सवाल खड़ा करते हुए कहते हैं कि अब चुनाव के वक्त अखिलेश यादव को आखिर आजम खान की याद क्यों आ रही है.आजम खान के नाम पर अखिलेश साइकिल रैली निकालकर चुनाव में मुसलमानों पर डोरे डालने की कोशिश कर रहे हैं. मौर्य के मुताबिक अखिलेश यादव का मकसद इसके अलावा कुछ और नजर नहीं आता है. वैसे अखिलेश यादव को इस मामले में जिस तरह से आलोचनाओं का सामना करना पड़ा है अगर गंभीरता से देखा जाए तो इसमें अखिलेश यादव का कसूर नजर आता है क्योंकि उनको आजम खान के लिए जिस तरह से आवाज बुलंद करनी चाहिए थी उसमें अखिलेश यादव नाकाम रहे हैं. जब ओवैसी की तरफ से यह इशारा मिला कि आजम खान पर जुल्म हो रहा है और पार्टी उनकी कोई ध्यान नहीं दे रही है तब अखिलेश यादव का माथा ठनका और उन्हें लगने लगा कि यदि आजम खान ने ओवैसी से हाथ मिला लिया तो फिर समाजवादी पार्टी की सियासी नैया यूपी में जो पहले ही भंवर में है वह काफी नुकसान उठा सकती है.इसलिए अखिलेश यादव ने देरी ना करते हुए फौरन आजम खान पर तवज्जो देनी शुरू कर दी. अब यह देखना दिलचस्प रहेगा कि क्या आजम खान समाजवादी पार्टी में ही बने रहते हैं या फिर अखिलेश यादव से उनकी बेरुखी में और इजाफा होता है.

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