Saturday, July 24, 2021
Home Latest News तो 2024 तक पहुंचेगी दीदी बनाम मोदी सियासी जंग?’

तो 2024 तक पहुंचेगी दीदी बनाम मोदी सियासी जंग?’

’कुछ समय पहले ममता ने पत्र लिखकर की भी थी विपक्षी पार्टियों को एकजुट होने की अपील’

’(शिब्ली रामपुरी)’
भाजपा खास तौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का सियासी मैदान में मुकाबला करने के लिए तो हमारे देश में कई नेता हैं. जिनमें अखिलेश यादव. अरविन्द केजरीवाल.शरद पंवार.मायावती. उद्धव ठाकरे. राहुल गांधी आदि वो प्रमुख चेहरे हैं कि जो किसी ना किसी तरह से भाजपा के मुकाबले सियासी मैदान में उतरते रहे हैं लेकिन अगर हम बात करें कि यह सभी नेता पीएम मोदी के सामने कितने मजबूती के साथ टिके रह पाते हैं तो जवाब यही मिलता है कि इनमें कोई भी ऐसा नेता नहीं है कि जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जैसा असर जनता पर रखता हो. राष्ट्रीय स्तर पर पीएम मोदी के मुकाबिल जो सबसे पहला नाम उभरकर सामने आता है वह है कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी. इसमें कोई दो राय नहीं है कि राहुल गांधी ने जिस तरह से अपनी सियासत का आगाज किया और वह जमीनी स्तर पर भी मुद्दे उठाते रहे हैं और उठा भी रहे हैं उससे उनकी राजनीति में सुधार जरूर हुआ है लेकिन पीएम मोदी के मुकाबले आज भी राहुल गांधी काफी कमजोर नजर आते हैं. ऐसे में पश्चिम बंगाल में दीदी बनाम मोदी सियासी जंग से एक संदेश पूरे देश में गया है और माना जा रहा है कि आगामी 2024 के आम चुनाव में भी यह जंग काफी रोमांचक होने वाली है. विपक्षी पार्टियों द्वारा ममता बनर्जी को 2024 में बतौर पीएम के चेहरे पर पेश करने में शायद ही कोई ऐतराज होगा. क्योंकि पश्चिम बंगाल के चुनाव में तकरीबन सभी विपक्षी पार्टियां ममता बनर्जी को अपना समर्थन दे चुकी थी और जिन्होंने नहीं दिया था वह भी खामोशी से ममता बनर्जी के मुकाबले चुनावी मैदान में नहीं उतरे. पश्चिम बंगाल में माना जा रहा था कि एमआईएम चीफ जिन पर अक्सर बीजेपी एजेंट होने के आरोप लगते रहे हैं वह काफी नुकसान टीएमसी का करेंगे और भाजपा को फायदा होगा लेकिन जहां जहां भी ओवैसी ने अपनी पार्टी के उम्मीदवार उतारे वहां पर उनका काफी बुरा हश्र हुआ और उनको पराजय का सामना करना पड़ा कई सीटों पर तो उनके प्रत्याशी किसी गिनती में ही नहीं आए इतने कम उनको वोट मिले हैं. हालांकि चंद सीटों पर ही एमआईएम ने उम्मीदवार उतारे थे भले ही उसने दावा चुनाव से पहले बहुत ही बढ़ चढ़कर किया हो क्योंकि इसकी प्रमुख वजह यह थी कि बिहार विधानसभा चुनाव में 5 सीटें जीतने पर असदुद्दीन ओवैसी काफी जोशो खरोश में थे और वह मान कर चल रहे थे कि जैसा बिहार में उन्होंने 5 सीटों पर कामयाबी हासिल की है ऐसी ही कामयाबी वो पश्चिम बंगाल में भी कर सकेंगे. लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ. यहां यह बात भी काबिले गौर है कि पश्चिम बंगाल में भले ही भाजपा सत्ता तक नहीं पहुंची लेकिन पीएम मोदी की लोकप्रियता पर इस चुनाव से कोई खास असर पड़ने वाला नहीं है.यूं तो पश्चिम बंगाल की राजनीतिक लड़ाई भी वहां के विधानसभा चुनाव को लेकर थी लेकिन जिस तरह से पीएम मोदी से लेकर गृहमंत्री अमित शाह और भाजपा के एक से बढ़कर एक दिग्गज नेताओं ने पश्चिम बंगाल में जाकर ममता बनर्जी के खिलाफ प्रचार किया उससे यह चुनावी मुकाबला एक तरह से राष्ट्रीय सियासत का केंद्र बन गया और हर किसी की निगाह इस पर टिक गई कि पश्चिम बंगाल में क्या होगा. आज जो नतीजे सामने आए हैं उनसे साफ है कि पश्चिम बंगाल में एक बार फिर से ममता बनर्जी का जादू चला है और यह लड़ाई भी दीदी बनाम मोदी होने की वजह से आगामी लोकसभा चुनाव तक भी यह सियासी जंग कायम रह सकती है और विपक्षी पार्टियां एकजुटता से ममता बनर्जी का नेतृत्व भी स्वीकार कर सकती हैं. काबिले गौर है कि ममता बनर्जी ने कुछ वक्त पहले विपक्षी पार्टियों को एक पत्र लिखकर एकजुट होने की अपील भी की थी.

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